मंगलवार, 23 अगस्त 2016

कौन मिलनातुर नहीं है?


आक्षितिज फैली हुई मिट्टी निरन्तर पूछती है,
कब कटेगा, बोल, तेरी चेतना का शाप,
और तू हों लीन मुझमे फिर बनेगा शान्त?
कौन मिलनातुर नहीं है?

गगन की निर्बन्ध बहती वायु प्रति पल पूछती है,
कब गिरेगी, टूट, तेरी देह की दीवार,
और तू हों लीन मुझमे फिर बनेगा मुक्त?
कौन मिलनातुर नहीं है?

सर्व व्यापी विश्व का व्यक्तित्व प्रति क्षण पूछता है,
कब मिटेगा, बोल,  तेरे अहं का अभिमान,
और तू हों लीन मुझमे फिर बनेगा पूर्ण?
कौन मिलनातुर नहीं है?

~ हरिवंशराय बच्चन

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